Rahul Sankrityayan : An introduction of the vagabond literary genius

पहले जन्मदिन पर चलना-चलने लगना मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। उसने भूमि का अपना अधिस्पर्श छोड़ दिया : अब वह तलवों-भर से उसे छूता हुआ पूरा जीवन गुज़ारा करेगा।

मगर चलना या चलने लगना भर मानव-उत्थान के लिए पर्याप्त नहीं है। चलते तो जानवर भी हैं : वे भी जो तैरते मत्स्य हैं , रेंगते सर्प हैं , उड़ते पक्षी हैं अथवा दौड़ते जन्तु हैं। चलने-भर से केवल जैविक वृत्तियाँ सम्पन्न होती हैं : भूख मिटती है , प्राण-रक्षा होती है और प्रजनन होता है।

मनुष्य के लिए गति के मायने मात्र इतने ही नहीं हैं। वह केवल जैविक वृत्तियों-भर के लिए नहीं जीता , वह उन निरन्तर विकासशील मूल्यों को भी सम्पोषित-संवर्धित करता चलता है —- जो उसे मनुष्य बनाते हैं , जो उसके और अन्य जानवरों के बीच में विभेद की एक रेखा खींचते हैं।

लेकिन अगर चलते संन्यासी और भिक्खु हैं, तो चलते चलती सेनापति और सिपहसालार भी हैं। चलते महात्मा हैं , तो आततायी भी हैं। यात्राएँ अगर बुद्ध करते हैं , तो चंगेज़ भी जड़ रहकर पनप नहीं पाते। यातायात के क्रम में हिंसक-दयालु , पशुधर्मी-विद्वान् , जन-हन्ता-विस्थापित सभी गतिमान रहते और दिखते हैं।

लेकिन राहुल चलने की दशा और दिशा सिखाते हैं। वे हमें बताते हैं कि चलना क्यों चाहिए और कैसे चाहिए। वे हमें अतीत से सबक लेने को कहते हैं कि चलने में क्षीण रह गयी जातियाँ कैसे इतिहास में धुँधले हस्ताक्षर छोड़ जाती हैं और चलने में शक्तिमान् कैसे आज भी नित्य नये अध्याय लिखती जा रही हैं।

राहुल का इतना परिचय ही दिया जाए कि वे यात्री हैं : तो न यह अल्पोक्ति होगी और न अतिशयोक्ति। क्योंकि संसार का सारा साहित्य हमें बाहर-भीतर चलना ही सिखाता है। व्यक्ति और समष्टि को सम्यक् गति का ज्ञान देना ही साहित्य का परम उद्देश्य है।

हम चलते हैं तो साहित्य चलता है। साहित्य चलता है तो हम चलते हैं। वह हमसे ही निकलकर हमारे ही आगे खड़ा हो जाता है। वह हमारी गति में आरोह-अवरोह लाने का इंगन करता है ; वह सही दिशा-सूचन के साथ आगे बढ़ने के लिए हमारा पथ-प्रदर्शन करता है।

हर साहित्यिक कृति एक नक्षत्र है , जो जगत् के कालिम अन्तरिक्ष पर टिमटिमा रहे हैं। इनमें अलग-अलग कान्ति की ज्योति प्रस्फुटित हो रही है। इनमें से कुछ राहुल सांकृत्यायन नाम के तारामण्डल के हैं। वे जिनसे अनवरत यायावरी का आलोक फूटा करता है। लेकिन राहुल केवल नक्षत्र-समूह भर नहीं हैं , वे दूरदर्शी भी हैं। वे कहते हैं कि इस जग के नभ की खग बनकर खोज करो , तभी मानवीयता के साथ पूरा न्याय कर सकोगे।

राहुल सांकृत्यायन को पढ़कर हम यातायात-धर्म सीखते हैं , यात्री-कर्म सीखते हैं , यायावर-मर्म सीखते हैं। राहुल हमें सिखाते हैं कि जो बाहर ठीक से चलना नहीं जानते , वे भीतर ढंग से चल न सकेंगे। जो तन से यात्री नहीं , वे मन से हो न पाएँगे। और जो यात्री हो न पाएँगे , वे जड़ रह जाएँगे। और इसी जड़ता ही दूसरा पर्याय मृत्यु है।

आज की इस तीव्र इक्कीसवीं सदी में चलना सीखने की हमें बहुत आवश्यकता है। हम तेज़ बहुत हैं , लेकिन भटके हुए हैं। हमारा चलना संगीत नहीं है , शोर है। हमें पहुँचने की शीघ्रता है , मार्ग का लय-ताल बिगड़ता है तो बिगड़ा करे। गन्तव्य के मोह में हम गमन का सुख बिसार बैठे हैं। मंज़िल जीतने की ख़्वाहिश में हम रास्ते को हार बैठे हैं।

आइए फिर एक साल के हो जाएँ। आइए फिर से चलने का यत्न करें। आइए राहुल की बात करें , उनके संग यातायात करें।

 

  • This introduction was written by Dr Skand Shukla,who is a rheumatologist, an immunologist, and a novelist. Order his latest offering, Adhuri Aurat  on Amazon. 

Leave Comment