एक प्रश्न


एक प्रश्न जो मुझमें करवटें बदलता है ,

दिलों में ना जाने कितनी ख्वाहिशों का दिया जलता है,

जाने कौन सा अरमाँ मोम की तरह पिघलता है ,

कौन जाने क्या है किसी के मन में ,

ज़िन्दगी के थपेड़ों से कौन गिरता कौन सम्भालता है। 

हँसते हुए चेहरे के पीछे ,

कितना है ग़म ?

चमकती आँखें ,कितनी हैं नम ,

इस राज़ को आजकल कौन समझता है ?

दुसरो के लिए जियो ,दुसरो के लिए मरो 

ये सब पुरानी बातें हैं ,

आजकल आदमी ,आदमी को छलता है 


अपने आप से पूछती हूँ कभी 

क्या सच है तपते सूरज के बाद 

शीतल चाँद निकलता है 

सुख के बाद दुःख ,दुःख के बाद सुख 

सृष्टि का चक्रव्यूह क्या यूँहीं चलता है ???

इस प्रश्न का उत्तर ना मै ढूंढ पायी ,

शायद इसीलिए ये आज भी मुझमे करवटें बदलता है. . . 

 

3 Comments

  1. बेहतर होता अगर आप इसे देवनागरी लिपि में ही लिखते , थोड़ा स्वाद बढ जाता !!

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