कलाकार

आज यूँ ही बैठे बैठे अचानक एक विचार मन मैं आया तो सोचा की उस को आप से साझा करू….
भाव और अभिव्यक्ति …
एक ही सिक्के के दो पहलू …
अब यह अभिव्यक्ति किसी भी प्रकार से व्यक्त की जा सकती है …
शब्दों के माध्यम से ,चित्रों के माध्यम से,भाव भंगिमाओ के माध्यम से ….
मेरा यह मानना है की कला का कोई भी माध्यम दूसरे के बिना अधूरा है….
बस हम को एक कुशल चितेरे की तरह इस बात का ज्ञान होना चाहिये की हमें कहा पर कौन सी रेखा खीच कर चित्र को पूर्ण करना है ….
इस सम्बन्ध मैं मैंने कही पढ़ा था की एक कलाकार के अंदर एक पूरी यंत्रशाला होती है ….
बस उस को इस बात का ज्ञान होना चाहिए की कब और कहा पर कौन से यन्त्र का इस्तेमाल करना है …..
और भाव स्वयं ही प्रवाहित होने शुरू हो जाते है …..
क्या आप सब इस विचार से सहमत है…..

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