Monthly Archives: February 2013

मुझे भी कुछ कहना है! or January 2013 LBC Meet

LBC1stAnivIn the first LBC Meet of 2013, we wanted to know more about each other through our writings. So the Author of the month was decided to be US.

One of the best meets LBC has ever had! I never knew our members were so talented writers.
Puja, you amazed me, I knew you just as the mother of my patient. Both the poem and the Cup Cakes were beyond compare. (I had a great difficulty restraining my desire to take home few of those delicious cakes).
Rashmi, I wasn’t surprised, I knew you had this literary side to you.
Ted (Jigar ) Mosby, your diary is worth reading, why dont you publish it.
Sulekha Ji, Life is actually a bed of roses, only you have to ignore the thorns. Looking to listen more of you in future meets.
Divya (I thought I would be meeting a girl when Masto informed me DP would be coming to the december meet 🙂 ) आप तो अब एक बड़ा सा नावेल लिखिये, ये छोटी छोटी कहानियों से मन नही भरता !
Deepti, I have already apologized. I am happy you read your piece yourselves. BTW did you read the same piece you mailed us?
PravinNitin , Kanak Ji, Pankaj Ji, Dr Jyotsana Ji,I missed the opportunity to hear you , but then there’s always a next time.

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Kanak Rekha Chauhan

सुना है मैंने

 

सुना है मैंने

वैज्ञानिक एक नया शोध करने जा रहे हैं

मुझे तो लगता है एक बड़ा

बेढब परिहास  करने जा रहे हैं

 

सुना है मैंने

अब रोबोट में भी भावनाएं जगा सकेंगे वो

मुझे तो लगता है

ब्रम्हाव्तार होने जा रहे हैं वो

 

सुना है मैंने

आजकल जीते जागते लोगों में

मनुष्यता भलमनसाहत जैसे भाव

मरते जा रहे हैं

 

सुना है मैंने

दया करुणा प्रेम सम्मान

ये जीवंत प्राणी

भूलते जा रहे हैं

 

ऐसे में

ये जीते जागते लोग

एक मशीन में

भला क्या प्राण फूँक सकेंगे ?

 

अजी  छोडिये,

एक सीधी साधी मशीन को

चैन से ही रहने दीजिये

कल-पुर्जों में विवेक को सोने ही दीजिये

 

ज़रा सोचिये ,यदि रोबोट में भी

जज़्बात उमड़ आये ,

तो फिर क्या होगा ?

ज़मीर-इमान जाग उठा तो फिर क्या होगा ?

 

देख दुनिया के दुःख

वो भी रोयेगा

प्रेम करके किसी से

अपना सुख-चैन खोएगा

 

लेकिन वैज्ञानिक ?

वो कहाँ सुनते हैं ?

वो तो

सिरफिरे होते हैं

 

वो फिर भी एक मशीन बनायेंगे

जिसमे प्राण जगायेंगे

और आखिर , अपने इस अविष्कार से

स्वयं ही अपने स्वाभिमान को ठेस पहुचांयेगे

 

कि जब, ईशवर रचित

इस देह में विहित

समस्त अनुभूतियाँ सब भाव

मानव ने स्वयं ही कुचल डाले है

 

तब रोबोट तो मात्र एक यन्त्र है

मनुष्य रचित त्रुटिपूर्ण तंत्र  है

क्या वो जी सकेगा संवेदनशीलता में , जी भी लिया तो

कब तक असफल रहेगा उसे कुचल डालने में

 

आग्रह  है तुम से

दुनिया के वैज्ञानिको

यंत्र को यंत्र ही रहने दो

उस पर ये क्रूर प्रयोग मत करो

 

करना है यदि पुण्य कोई काम

मानव में भी संवेदना जगा दो

मनुष्य को फिर एक बार

इंसान बना दो

 

रात 

 

रात अँधेरे में जब

सारा जहां, सारा शेहेर,

और मेरा सारा कुनबा सोता है,

तब जाग उठता है मन का सन्नाटा

 

और पता नहीं क्यूँ – ये रूह,

जो दिन के कोलाहल में

भी कभी नींद से नहीं उठती,

अचानक जाग जाती  है !

 

कमरा दर कमरा

कमरे से आँगन

आँगन से बगिया

बगिया से छत – और छत से चाँद

 

और फिर, चाँद से वापस ज़मीन पर

मुझको ला पटकती है,

बाँवरी है खुद भी भटकती है,

और मुझको भटकाती है

 

नाचती हूँ मैं और वो,

मुझको नचाती है बेतहाशा

एक  रक्स !

बीते लम्हों की बिखरी हुई किरचों पर

 

वही यादें वही पल, फूलों सी  नरमी से

जिनको जिया है मैंने,

न जाने क्यूँ कांच की तरह

मेरे पाँव छलनी कर जाते  है

 

भटकते-भटकते, नाचते-नाचते

जो खून पाँव से रिसता है रात भर  ,

उसके दाग़

मुझसे धोये नहीं जाते है दिन भर

 

 

और क्या मिलेगा

धोकर वो निशाँ ?

रात फिर होगा इक बदहवास रक्स

और फिर ज़ख्म-ज़ख्म होंगे मेरे पाँव

 

रात दर रात

ज़ख्म दर ज़ख्म

दाग़ दर दाग़

आखिर कब होगा ये सिलसिला ख़त्म ?

 

क्या कोई है जो

रात के सन्नाटे में

धुन कोई मधुर सुनाएगा

 

क्या कोई है जो

डूबते अँधेरे में एक

भटकती आत्मा को राह दिखायेगा

 

क्या कोई है जिसका स्पर्श

सुप्त देह को

जागृत आत्मा से मिलवायेगा

 

क्या कभी तुम आओगे कान्हा ?

शरण मुझे ले पाओगे कान्हा ?

क्या कृन्दन  मेरे ह्रदय का सुन पाओगे कान्हा ?

 

तुम आओ या न आओ

रात तो फिर भी आएगी

रूह के जाग जाने  का डर साथ लाएगी

 

और नींद इन आँखों से

फिर कहीं दूर चली जाएगी

कहीं दूर चली जाएगी

 

रेशमी  रेशमी एक रज़ाई  

 

छोटी थी मैं,

जब माँ ने बनवाई,

रेशमी रेशमी एक रज़ाई

 

सुर्ख चटख रंग था उसका , तीन  किलो  वज़न था उसका

वो नरमाहट, वो गर्माहट

माँ जैसा ही रुपस्वरुप था उसका

 

चौराहे वाले फन्ने सिद्दीकी

नयीनयी दुल्हन थी जिनकी 

उन्ही मेहँदी लगे हाथों ने, रुई धुनी थी उसकी

 

पक्केपक्के धागों से की थी तगाई

तब जाकर बन पायी  

रेशमी रेशमी एक रज़ाई  

 

राम खिलावन  भय्या

रखकर उसको अपने सर

सीधे लेकर आये घर

 

“आ गयी गयी मेरी रज़ाई   गयी

पर भय्या बोला, नहीं नहीं !

दीदीतेरी नहीं, मेरी रज़ाई  “

 

फिर एक बार घर में हुई लडाई 

आखिर तय हुआ यह  –एक दिन भय्या की

और  –एक दिन रहेगी मेरी रज़ाई    

 

सर्दी सर्दी निकाली जाती

ओढने से पहले, धूप में डाली जाती

रेशमी रेशमी वो रज़ाई    

 

खुशी के  दिनों में ,

लोटकूद  कर

हक जतलाती अपना उस पर

 

समय कठिन जो आता मुझ पर

रो लेती,

दुबक उसके भीतर

 

सुख-दुःख अपने कह लेती उससे  

सखी बन गयी थी मेरी

रेशमी रेशमी एक रजाई  

 

फिर, बड़ी हो गयी मैं, बूढी हो गयी वो,

ब्याह होने को था और एक बार फिर घर में आयी

रेशमी रेशमी कोई  रज़ाई        

 

फोरेनकी है

कितनी कोमल कितनी हलकी

माँ ने बतलाया,

 

बोलींअब यही फैशन  में है

रुई से ज्यादा गरमाती है

एक्रिलिक कहलाती है

 

घर छूटा, छूटे माँ और बाप

और वो सब जो था मेरा हो गया भाई का 

और उसी की हो गयी रेशमी रेशमी वो रज़ाई   

 

कितने पतझड़

कितने बसंत

कितने सावन बीत गए,

 

जब जब आती सर्दी दुखदायी

मुझको याद जाती

रेशमीरेशमी वही रज़ाई     

 

जब जब भी मैं जाती पीहर

ललचाती आँखों से देखती

अपनी सखी को नैना भर कर

 

नहीं जुटा पाती हिम्मत

कह दूंभय्या अब तो मुझको दे दो

रेशमी रेशमी वो रज़ाई   “

 

समय विकट फिर कुछ ऐसा आया

 

छोड़ चला भय्या माता पिता का साया ,

और घर-बार,

बना लिया उसने अपना अलग संसार

 

जिसमे रहते गुड़िया , अप्पू  भाभी और भाई

पीछे छोड़े गया तो बस  – यादें दुखदायी

और छोड गया रेशमी- रेशमी एक रज़ाई   

 

वो भी हो गयी थी बेकार उसके लिए

जैसे हो चले थे बूढ़े,बेकार

माँ बाप उसके लिए  

 

पर जैसा कह गए ज्ञानीध्यानी

कुछ तो अच्छा होता है

जब ऊपर वाला करता है मनमानी

 

अब सिर्फ और सिर्फ मेरे हैं,

मेरे मातापिता

और रेशमी रेशमी वो रज़ाई   

 

Sulekha Pande

1 ) नारी:

 

मैं ,मैं नारी हूँ ,

स्वर्ग से उतरी ,अमृत की वह पवित्र बूंद ,

जिसको पीने से ,अमरत्व की प्राप्ति होती है ,

पर क्या ,आज भी वह  दर्जा आ सकी हूँ मैं ??

जो मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए .

सबको नज़र आता है , तो , सिर्फ मेरा रूप ,

टिकती हैं  सबकी  आँखें ,

मेरी आँखें  , मेरे होंठ , मेरे वक्ष पर …

क्या मेरी आँखों में झांक कर देखी है , किसीने ,

मेरी वेदना , ,

सुना है मेरा मूक चीत्कार ,

क्या सुने हैं किसीने ,

मेरे होंठों के अनकहे शब्द ??

क्या किसी ने कभी सोचा ,

कि ,मेरे अंदर एक हृदय है ,

जो संवेदनशील है , जो धड़कता  है

जो धधकता है ,

जब तुम मुझे खुद से ,छोटा , हीन और कम अक्ल मानते हो .।

क्या तुम कभी माप पाये ,

मेरे हृदय की अंतहीन  सीमारेखा ?

तुम तो मुझे देवी बना कर पूजते रहे ,

पर देवी तो पाषाण  है ,

मैं तो इन्सान  हूँ मगर  तुम  मुझे  इन्सान मानते

तो , कभी दोयम दर्जा ना देते . दोयम मैं हूँ भी नहीं ..

तुम नर हो , मुझमें तुमसे दो मात्राएँ अधिक हैं ,

मैं नारी हूँ , तुमसे कहीं अधिक सबल ,तुमसे कहीं अधिक सशक्त ..मैं पराधीन नहीं मैं पराधीन नहीं ….

 

2 ) बुलबुलें ,

 

कितना मीठा गाती हैं ,

पर सुना है ,

कि ,

वक़्त के साथ   ,

बुलबुल के गले में ,

एक कांटा उग आता है ,

जो उसकी मौत की वजह 

बनता है ,  

 

रिश्ते भी कुछ ऐसे होते हैं ,

नर्म , मुलायम , तितली के परों से ,

नाजुक रिश्ते ,

ना जाने कब सख़्त हो जाते हैं ,

ढल जाते हैं ,

एक दायरे में ,

जो टूट जाते हैं ,

पर जुड़ नहीं पाते ,

जुडते हैं , तो पैबंद लग आते हैं ,

मखमल में टाट से ,

रिश्ते तो रिश्ते होते हैं ,

 

कभी तल्ख़ अलफाज ,

कभी कड़वी जुबान ,

कभी अनजान अजनबी मोड ,

 

अपने रिश्तों  में ,

कांटा मत उगने दो

नर्म रुई से रिश्ते ,

गर्म हाथों से सहेजे जाते हैं ,

नर्म एहसास में लपेटे जाते हैं ,

उन्हें प्यार भरा रहने दो ,

उन्हें प्यार भरा रहने दो ……….

 

3 ) रिश्ते …….

 

रिसते रिश्ते ……

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते ..

कुछ रिश्तों के अंजाम नहीं होते …

कुछ रिश्ते ज़ख्म दे जाते हैं ,

कुछ रिश्ते ज़ख्मों को भर जाते हैं …

रिसते रिश्ते …….

बूँद बूँद कर ,,

रिस जाता है …

सारा स्नेह , सारी ममता , सारी कोमलता ,,

सारा प्यार …

और रह जाते हैं ,,

खोखले घड़े ,

रिश्तों के , खोखले नाम ..

ख़ाली परिभाषाएं …

रह जाते हैं ,

रीते हाथ ………

हमें पता ही नहीं चलता ,

कि कब ,,

सतरंगी इन्द्रधनुष से रिश्ते ,

पिघल कर बह जाते हैं ….

और रंग बिरंगी टूटी चूड़ियों के कांच से ,

लहूलुहान हमारे पाँव ….

हमें उस इन्द्रधनुष तक नहीं ले जाते …

जहाँ उस खूँटी पर टँगी ,,

हमें मुंह चिढ़ा रही है , हमारे बचपन की ,,

भोली सी सोच … कि

जीवन फूलों की सेज है …….

 

 

pujasriPooja srivastava

 

जानना चाहते हो की मेरे लिए क्या हो तुम??
हर बार  ‘क्यूँ’  का जवाब मांगते हो मुझसे
खड़ा कर देते हो हर बार कटघरे में मुझे और
फिर जवाब जाने बगैर ही दोषी भी करार देते हो मुझे..
फिर कहते हो निर्दैयी हूँ मैं??
हर बार होते हैं सवाल तुम्हारे पर
मेरे जवाब का इंतज़ार नहीं होता उन्हें…
तो बार- बार फिर क्यूँ पूछा करते हो मुझसे इतने सवाल??
यूँ ही नहीं ख़त्म नहीं होगा तुम्हारे सवालों का ये सिलसिला क्यूंकि
मेरे जवाब के बैगैर अधूरे हैं तुम्हारे सवाल.
मेरे जवाब का इंतज़ार नहीं करते हो तुम कभी, तो अच्छा है, क्यूंकि
मैंने उन्हें बहुत दिनों पहले ही दे दिया था तुम्हें और

कहा था की बहुत संभाल  कर रखना इन्हें, बड़े नाज़ुक हैं ये..!!!

एक बार छूट कर गिर गए थे तुम्हारे हाथों से, फिर,
तुमने ही उठाया उन्हें- दरार सी दिखी थी मुझे, चोट भी थी और दर्द भी
फिर सोचा शायद अब सँभाल लोगे तुम उन्हें, क्यूंकि,
अब तुम भी जानते होगे कितने नाज़ुक हैं वो..!!!
फिर मेरे देखते देखते वो फिसल गए तुम्हारे हाथों से…!!
तुम्हें मालूम भी नहीं पड़ा और मेरे एहसासों को तोड़ दिया तुमने..!!

अब भी सवाल तुम्हारा- “क्यूँ ?? क्यूँ नहीं दिया मैंने फिर से
उन्हें तुम्हारे हाथों में??”
जवाब मेरा – तुम्हारे पास ही तो हैं वो..तुम्हारे कमरे के किसी
कोने में.. धूल की परतों के बीच…!!

धूल की परतों को साफ़ करोगे तो मैले हो जायेंगे हाथ तुम्हारे
फिर उन्हें देख कर भी क्या पाओगे तुम?? किरिच- किरिच कर
बिखर जायेंगे वो- “क्या फिर जोड़ सकोगे उन्हें तुम??”
तुम्हारे सवालों के जवाब तो मैं दे भी दूं शायद पर
क्या तुम  दे सकोगे मेरे सवाल का जवाब मुझे??

शायद नहीं, क्यूंकि, जिंदगी को जिस रंगीन चश्में से
देख रहे हो तुम, उसे उतारना होगा तुम्हें..खुद ही मिल जायेंगे
फिर तुम्हारे सारे सवालों के जवाब तुम्हें…और फिर
ख़त्म हो जाए शायद ये तुम्हारे सवाल जवाब का सिलसिला भी…!!!

 

 

मॉ

 

कई दिनों से बार बार कलम उठाती हूँ फिर, कुछ शब्द लिखे, फिर उन्हें इतनी बार काटा

की ध्यान से देखने पर भी कुछ दिखाई न दे…

अपने डर को हर बार कागज़ पर नहीं लिखना चाहती मैं, परन्तु

हर जीवित व्यक्ति की भाँती मैं भी, जीवन के प्रति अपनी आस्था

छोड़ नहीं पाती, तो,

लेकर बैठ ही जाती हूँ कागज़- कलम जिससे अंतर्मन के झंझावत और डर

को कागज़ पर लिख कर, जीवन के प्रति अपनी अटूट आस्था को मज़बूत रख सकूं ..

 

मेरी माँ कहती थी मुझसे की मैं सपनों में जीती हूँ.. पर मैं माँ को कैसे बोलूँ .. मेरे सपनों

की दोस्ती नहीं है अब परियों से..माँ मैं अब सपनों में जीती नहीं मर जाती हूँ..

अब वो सपने नहीं देखती मैं जिनके सच होने का इंतज़ार होता है..क्यूंकि अब मेरे सपनों में

रौशनी नहीं शमशान घाट सा अन्धकार और भयानक सन्नाटा होता है..

माँ, मुझे डर लगता है अपने चारों ओर रिश्तों की लाशों को जलते देख कर,

क्योंकि हर रिश्ता कहीं न कहीं मेरे दिल से होकर जाता है..

माँ मुझे बहुत डर लगता है मैं सच कहती हूँ, क्योंकि, इस शमशान में हर रोज़

एक नया रिश्ता जलने के लिए आता है…

मैं हर रिश्ते की राख बटोर कर घंटों रोती हूँ, कभी कभी तो मैं खुद अपनी

चीखों से डर जाती हूँ.. क्योंकि माँ, इस शमशान घाट में मैं हमेशा खुद को अकेला खड़ा पाती हूँ,

कैसे बोलूँ माँ को की, “माँ मैं अब सपनों में जीती नहीं मर जाती हूँ…!!!!”

 

 


Ananya Pandey

  1.  कल जो इंसान मिला था
    आज वो खामोश है
    कल याद भी न रहेगा की . . .
    किसी को फ़रिश्ता कहा था उसनेमैं नादान हूँ ,
    अनजान हूँ
    कल बहुत खुश थी
    आज. . . कल सी होना चाहती हूँ
    कल इंतज़ार होगा
    फिर कोई फ़रिश्ता कहने वाला मिले ..
  2. जाने क्यों नहीं ढूंड पाती मै
    तुममे भी
    फूलों की नरमी, इन्द्रधनुषी रंग, कोई कविता, कोई स्वप्न
    तुम मेरे लिए बस तुम ही रहते हो
    तुम्हारा इतना भर होना ही मेरी जरूरत भी ..
  3. कितना सहज ::
    दो पलों का प्यार
    कितना सरल !
    कितना कठीन!
    कितना सहज
    यह संयोग !
    कितना सहज
    यह
    अलगाव !!!
  4. देख कर भी चुप हूँ
    पर सोच में शांत नहीं
    हँसती हूँ दो पल .. .. बहुत
    पर नैनो में यह पानी कैसा
    वह जल की वह बूंद हूँ
    जो आँख में बहती हैं
    कुछ कुछ धुंधली – धुंधुली
    क्यूंकि
    देखकर ऐसा लगता हैं
    जैसे उसे पहचानती हूँ
    शायद …..
    मन में रूपाकार बसा है
    या,
    यूँ कहू ……
    मेरे ह्रदय में प्रेम बैठा रहता है !

 

Divya Prakash Dubey

Kitty

हाँ kitty ही नाम था उनका, हाँ थोड़ा अजीब है। उम्र यही कोई 40 साल। गजब के ज़िंदादिल, मस्तमौला आदमी हमारे मुहल्ले में ही रहते थे या यूँ कह लीजिए हम उनके मुहल्ले में रहते थे। kitty भैया का असली नाम शायद उनके स्कूल और कॉलेज के certificate के अलावा कहीं भी दर्ज नहीं था। दफ्तर में भी सब kitty ही जानते थे। बस kitty भैया वाली गली में रहते हैं, यही हमारा पूरा पता हुआ करता था। रोज़ कहीं-न-कहीं से कुछ अच्छा खाने को लाते और जबरदस्ती खिलाते थे। इस आदत से उनके घर वाले बहुत चिढ़ते थे कि फालतू में पैसा लुटाते हैं। लेकिन kitty भईया पर इन सब तानों का कभी कोई असर होते नहीं दिखा।

अक्सर छत पर टहलते हुए मिल जाते थे। नवरात्र छोड़कर पूरे साल दारू और हर बार दारू के बाद एक ही रोना-

“यार हमारा मन कहीं और था….उससे खूबसूरत लड़की थी नहीं कोई…..बहुत प्यार करते थे उससे…””

““क्यूँ, अब नहीं करते प्यार?”“ मैंने पूछा।

“करते हैं, लेकिन यार अब बच्चे बड़े हो गए। लड़के बड़े हो रहे हैं, बड़ा वाला तो साला अबकी Bsc कर लेगा।” “

““तो शादी क्यूँ नहीं की आपने उनसे?” “

ये ऐसा सवाल था जिसको सुनकर, हर बार बहुत देर तक खामोश हो जाते और थोड़ी देर बाद जैसे ही मैं चलने लगता तो रोक कर पूछते-

““MBA कि तैयारी कर रहे थे न तुम?” “

““हाँ भईया।” “

““तुम्हारे भईया की बहुत जान पहचान है, पेपर दे लो। अगर admission में दिक्कत आए तो बोल देना हमें, लखनऊ में जितने बड़े कॉलेज वाले हैं ना, सब हमारे साथ पीते हैं। इतना काम  करते हैं इन सालों का, एक अपना काम भी बोल देंगे।” “

““ठीक है भईया।”“ इतना बोल कर मैं चल देता।

खैर ये तो उनका रोज़ का रोना था। रजिस्ट्री ऑफिस में थे तो रोज़ का 2-3 हज़ार पा जाते थे और सूखी-सूखी हर महीने की तन्ख्वाह अलग। माता, पिताजी, बीवी और बच्चों से लेकर पड़ोस वाले, घर के नौकर सभी का हिस्सा था उन्हीं 2-3 हज़ार रुपयों में।

माताजी की पता नहीं कौन-सी पूजा होती, वो अपने हिसाब से बिना बताए kitty भैया की जेब से पैसे निकाल लेती थीं। हाँ बस इस बात का खयाल रखती थीं कि रोज़ की पूजा, पूजा ही लगे हवन नहीं। महीने में दो हवन भी कर ही देती थीं… शायद मंदिर जाकर करती थीं। क्यूँकि हवन के बाद कभी कोई प्रसाद बँटा नहीं मुहल्ले में।

पिताजी का भी यही हाल था। बस माताजी की पूजा पिताजी की दवाई थी और माताजी के हवन, पिता जी के medical checkup जिनकी रिपोर्ट कभी आ ही नहीं पाती थी।

बचे-कुचे दोनों लड़के अपने हिसाब से पॉकेट money निकाल लेते थे। मोबाइल का रीचार्ज और पेट्रोल के बढ़ते दामों का असर उन्हीं पर सबसे ज़्यादा हुआ था।

घर पर सबको kitty भैया के रोज़ पीने की इतनी आदत हो चुकी थी कि अगर कभी गलती से ना पीएँ तो माहौल बड़ा खिंचा रहता था। न माताजी की पूजा हो पाती थी, न पिताजी की दवाई आ पाती थी और ना ही लड़कों की bike में पेट्रोल भर पता था।

एक और रिकॉर्ड दर्ज था kitty भैया के नाम, कि इतने सालों दारू पीने के बाद भी उन्होंने कभी किसी के साथ बदतमीजी नहीं की। बल्कि मुहल्ले भर के महरी (बर्तन माजने वाली) और जमादारों की उतनी लड़कियों की शादी के पैसे दे चुके थे जितनी लड़कियाँ कभी पैदा ही नहीं हुईं।

इस आदमी ने भी जैसे कसम खा रखी थी कि कभी किसी को किसी भी काम के लिए मना नहीं करेगा, किसी को भी खाली हाथ नहीं लौटाएगा। रोज़ दफ्तर जाने से पहले मंदिर जाना और वहाँ पंडित जी को 21 रुपये देकर दिन की शुरुआत करना। पंडित जी का आयुष्मान भव: आशीर्वाद देना और बताना कि कैसे इस बार नवरात्रि पर अखंड ज्योति जलने कि तैयारी हो गई और इस महायज्ञ में kitty भईया कैसे मुद्रारूपी आहुति दे सकते हैं। फिर पंडित जी का दोहराना- “सबसे नहीं बोलते हैं आहुति के लिए, केवल योग्य सामर्थ्यवान लोगों द्वारा ही ये कार्य संपादित हो, ऐसी देवी माँ की इच्छा है।”  इसके बाद kitty भईया के मंदिर से चलने के पहले अपने बड़े भाई वाले जमीन के टुकड़े को पुनः प्राप्त करने की मंशा व्यक्त करना, कि जमीन का टुकड़ा मिल जाता तो उसमें भी एक छोटा-सा देवी माँ का मंदिर बन जाए; ऐसा सपना उनको देवी माँ ने दिखाया है। जिस दिन पंडित जी ज़्यादा देर बात करने लगते उस दिन kitty भईया को 21 नहीं 51 रुपये देने पड़ जाते।

मंदिर और पंडित जी की आध्यात्मिक दुनियादारी से आगे बढ़कर kitty भईया असली दुनियादारी के मंदिर अर्थात दफ्तर रूपी कर्म भूमि में पहुँचते। 11 बज चुके होते, कुछ लोग आ चुके होते और कुछ आने वाले होते। सारे सरकारी दफ्तर करीब-करीब एक से ही लगते हैं, लोगों का आना-जाना दिन भर लगा रहता है। कुछ लोग देर से आते हैं तो कुछ लोग जल्दी जाते हैं और बचे हुए देर से आते हैं और जल्दी जाते हैं। दफ्तर से जल्दी जाने का मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि फलाँ आदमी काम नहीं कर रहा है। अक्सर दफ्तर की सबसे काम की बातें दफ्तर के बाहर ही की जाती हैं।

कभी आपको रजिस्ट्री ऑफिस में जाना पड़े तो देखिएगा, लगेगा पूरा शहर ही जमीन खरीद बेच रहा है। 99 प्रतिशत खरीदने बेचने वाले लोग अच्छा Investment करने वाले लोग हैं और बचे -कुचे 1 प्रतिशत वो भी मिल जाएँगे जिनको एक छोटा-मोटा घर बनवाना है, जिसके लिए पैसा जोड़ने में उनकी पूरी उम्र लग गई। Kitty भईया इस बात का पूरा खयाल रखते थे कि अपना कट केवल उन लोगों से लें जो अच्छा Investment करने वाले लोग हैं।

मैं जब खाकर छत पर टहल रहा होता, तो पकड़ लेते और दारू चढ़ने के बाद बोलते-

“जानते हो असली corruption क्या हैं?”

“corruption, corruption है, असली नकली क्या भईया ?”

“अबे तुम छोटे हो, तुम्हें नहीं पता। देखो, मोटी party से छोटा पैसा लेना और छोटी party से मोटा पैसा लेना; असली corruption है“

Corruption की इतनी ईमानदार परिभाषा मेरे लिए बिलकुल नयी थी। हर बार ऐसा ही कुछ-ना-कुछ ईमानदार और अनोखा बोलकर kitty भईया पेग बनाते हुए आसमान में चाँद और चाँद में वो लड़की निहारने लगते। 2-3 पेग के बाद पूरी दुनिया में सिर्फ दो लोग बचते और मैं पढ़ने के बहाने अपने कमरे में आ जाता।

भाभी को कभी कुछ पैसे ज़्यादा दे दिए तो अगले दिन दफ्तर जाने के बाद सास बहू को माँ-बहन की गाली जरूर सुनाती-

“शादी के बाद ही पीने लगे……संभाले ना गए तुमसे….खा गई हमारे kitty को“

हाँ एक और अजीब बात थी उनके घर में, जिस दिन दारू नहीं पीते घर से ज़ोर-ज़ोर से लड़ने की आवाज़ आती। अपनी लाख खामियों की बावजूद माताजी की बहुत इज्ज़त करते थे। सो कभी अपनी बीवी को पिटते वक्त बचा नहीं पाए। बस बीवी के सामने जाकर अकेले में रोकर माफी माँग लेते और अगले दिन महँगी साड़ी ले आते। रोज़ की करीब यही कहानी थी। दारू वैसे ही चलती रही, चाँद वैसे ही निकलता रहा।

मेरे MBA के बाद मेरी नौकरी लखनऊ में लग गई। इधर उनकी तबीयत कुछ खराब रहने लगी थी। लेकिन ना ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं आई; ना दारू में। एक दिन ऐसे ही दिवाली पर  मिल गए। जबरदस्ती हाथ में 100 रुपये पकड़ा दिए और बोले पटाखे खरीद लेना।

“मैं बड़ा हो गया हूँ भईया, कमाने भी लगा हूँ।”  “

“साले अपने भईया से ज्यादा कमाने लगे हो क्या…आशीर्वाद दे रहें हैं, रखो बे… मिठाई खा लेना।“ इतना बोल के कुछ सुनते नहीं थे आगे बढ़ जाते थे। मेरे जैसे ना जाने कितने लड़के थे मुहल्ले में, जिनके साथ वो होली-दिवाली ऐसे ही और इतनी ही मनाते थे।

यूँ ही होली-दिवाली पर आशीर्वाद का सिलसिला जारी रहा। भोपाल transfer के बाद kitty भईया से बात लगभग बंद हो गई, बस होली पर उनका फोन आया।

“तुम्हारे मिठाई के पैसे घर पर मम्मी को दे दिए हैं।”

“अरे इसकी क्या जरूरत थी भईया!”

“रखो बे…मिठाई खा लेना…इधर लखनऊ आना तो मिलना। वहाँ कोई दिक्कत हो तो बोलना। वहाँ पर भी तुम्हारे भईया की बहुत जान-पहचान है।” इतना बोल के फोन काट दिया।

होली के दो दिन बाद ही खबर आई कि kitty भईया नहीं रहे। दारू ने शरीर खोखला कर दिया था। ये ऐसा झूठ था जिसे सबने चुपचाप वोट देकर भारी मतों से विजयी बनाया था।

मुझे बहुत गुस्सा आया और खुशी भी हुई कम-से-कम उनका रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरना बंद हुआ। दारू वैसे चलना बंद हो गई, लेकिन चाँद वैसे ही निकलता रहा।

बड़े लड़के को उनकी जगह नौकरी मिल गई है। लड़का अपनी दादी को गाली देना सीख गया है। माताजी की पूजा अब पहले जैसे नहीं होती, ना ही पिताजी कि दवाई आती है और दफ्तर में भी corruption बढ़ गया है।

इस बार दिवाली पर घर गया, तो मैंने उनके दोनों लड़को को बुला के 100-100 रुपये जबरदस्ती पकड़ा दिए। तो बड़ा वाला लड़का बोला-

“मैं बड़ा हो गया हूँ भईया, कमाने भी लगा हूँ।“

“साले अपने भईया से ज्यादा कमाने लगे हो क्या…आशीर्वाद दे रहें हैं, रखो बे… मिठाई खा लेना ” मैंने प्यार से डाँटते हुए कहा।

अब जाकर यकीन आया kitty भईया सही में  नहीं रहे ।

 

 

 

Deepti Khetarpaul Grover

The Privilege Of Being A Woman…

 

A cliché topic…you all have heard many views  ,opinions and read all kinds of  articles on this burning topic.

I am not a writer, in fact I have never written any such thing but I have read and read a lot. So I will just try to portray what I think in the least manner I can.

I have been a homemaker all my life and my first attempt to break this was joining LBC and then attending its first meet. Actually, when I went to Sangita’s house …I was pretty scared but once the conversation started I got comfortable. Amongst all the conversations ..there was this small discussion when Kanak Ji asked all men present there if they wanted to be a woman in their next life. To my surprise all of them said NO. WHY..?? And we always sit and have discussions on topics like woman empowerment, equality,etc.! Maybe one of the reasons for all of them to say this was because they knew that women were, are and will always be  given a second place vis-à-vis men. Women are often called the weaker vessel. I think we should first bring a change in our thinking and this very thought of equality should be shown in our actions as well. Only then will we make a small but strong change in society.

As for myself ..I want to be a woman in all my next lives. Yes, like every other woman I too have experienced the feeling of being inferior to men…in some way or the other, but it was there . However, I strongly believe that men are given the first place because we let them do so. So we have to change our mentality first. As a woman, I  accept all the drawbacks of being one, then too I think being a woman is a wonderful experience and out of all the lovely phases of life the best part is motherhood. This feeling is sacred, heavenly, marvellous in fact the best feeling ever but it isn’t just a feeling, it’s a beautiful perception- the privilege of BEING A WOMAN!

 

 

Rashmi Shukla Bajpayi

THE PARAMETERS

 

 

“Most girls are easy to read, but not you”, said Radha eying Jayanti with a mock exasperation.

“Simple! Its freaking cold and don’t want to go into the kitchen to prepare coffee. Let’s drive till nearby mall to have our brew in Atrium’s coffee shop.” Jayanti disclosed the mystery of her abrupt call to Radha.

 

The dip in mercury also brought the pleasant dip into moving vehicles. Girls were enjoying the hassle free driving on neat roads. All of a sudden, Jayanti asked to stop the car. While sitting in car, Jayanti looked across the road at the pavement side which has now become the  refuge to the  Banjara folks. As the car stopped, half claded kids and over claded two-three gypsy women rushed towards the car in confused happiness. The olive skinned woman,who seemed the eldest one, came closer and asked, “want to see these modhas(stools), potteries? I also have coloured stones for rings and beads for necklace”.

The woman was looking a complete riot of colours. Her ordhni was of extra basanti yellow colour adorned with mirrors, chunky cowrie shells edged with rainbow cloth balls.the struggles of her life did not wethered her admiration towards the  bright colours.

“No nothing this sort”,said Jayanti “May I have a similar kind of lehanga?” the words from Jayanti startled her but soon she sensed the peoples peculiar choices which at times get developed with the ballooning bank balances. As a sharp business woman she said, “An easy task for me, just give me five minutes I already have the embroidered flaps, just need to seam it together, even your tailor can do that”.

Hiding the glint in her eyes Jayanti asked, “all that is fine but how much it will cost me”. The banjara woman once again assessed her swanky car and rich appearance,  firmly said,  “Madam ji 600 rupees”.

“Such an exhorbitant price! What point are you trying to make?” snapped back Jayanti.

“Ohh! Madam ji, I will make your lehanga one in a million, more elaborate with the stripes of mirrors, cowrie, shells and even attach an extra waist band. Rupees 600 is a fineand reasonable  price”.

 

Radha who was sitting quietly in the car, was all flustered at Jayanti’s mean negotiations. Hiding her annoyance , Radha,  barely managed to say, “it is looking too vibrant to ignore.”  Jayanti winked at Radha and signaled her to remain silent. Jayanti again looked at the woman and said in sullen voice, “tell me quickly the final price I will not pay such a huge sum for it”. The gyspy said in jiffy,” ok madam ji pay me rupees 500”.

“Shhhhh.. such an unreasonable price…. Don’t want it”.

Saying this she opened the car door and pretended to step in.

The gyspy woman looked up into the dark sky, sensed the ‘Clouds Conspiracy’ against her, gave another look to her feeble, dripping tent. Taking a deep sigh she handed over the intricately embroidered flaps, waist band with extra sheen into Jayanti’s hands. “Madam give what you find Reasonable”. “Excellent ! Take these rupees 400”. The banjaran lady accepted it with frigid clam and Jayanti sat back in car with a look of accomplishment. “Let’s rush to café having an intense craving for coffee”.

Radha drove in silence. After parking the car they stepped into the crowded mall. The happy Jayanti broke the silence, “Ohhhh.. I just forget about this season’s end sale.Let’s surf showrooms first, till then, lets manage our caffeine craving”. Both the friends rushed into their favorite ‘Zara’ showroom. It seemed as if a micro tornado was ripe there. People were surfing the hangers and shelves like champions. All were relishing the rush of adrenaline caused by sale.

Jayanti found herself spell bound to mannequins’s neck piece and exclaimed in sheer excitement, “Radha look at this neckpiece, so vibrant, so bright and so very ethnic. Its perfect accessory to enhance my glam quotient in the coming weekend party. It has  themed  after ‘Tribal Charm’.What a headturner I am going to be, with that lusturous lehnga skirt and this necklace” Hurriedly, Jayanti checked the price tag, “O God!!! can’t believe the price, after discount, it will cost me just rupees 1600. Such a Reasonable price!”

Driving back to home Radha once again passed the tribal patch of the pavement. Looking into the rear view mirror, Radha was constantly hammered by the thought of ‘Reasonable Parameters…..’

 

Monthly Meet-February ’13

M_Id_252173_Ruskin_BondRuskin Bond is the author of the month for February at the Lucknow Book Club.
Though he is living and writing in our own state, U.P. (now Uttarakhand) since 1963, the UP Board mentioned him dead in their text books. Such is the level of ignorance amongst the U.P. Babus. Though Sanjay Mohan, Director UP Board, apologized to him,the episode prompted us to name him the author of the month.

We meet on 24th February 2013 at 2.30 pm.

Venue of the meet remains undecided yet. Please suggest suitable venue, or we meet at Masto’s Office as before.